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Tuesday, 10 February 2015
#DelhiDecides #KiskiDilli: अरविंद केजरीवालः सड़क से सत्ता तक...
#DelhiDecides #KiskiDilli: अरविंद केजरीवालः सड़क से सत्ता तक...
26 मिनट पहले
आम आदमी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली चुनाव में अप्रत्याशित प्रदर्शन किया है.
नवंबर, 2012 में बने राजनीतिक दल 'आम आदमी पार्टी' के नेता केजरीवाल ने अगले ही साल 2013 में चुनावी सफलता का स्वाद चख लिया. उनकी पार्टी साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. लेकिन
कांग्रेस के समर्थन वाली उनकी सरकार 49 दिन ही चली. मुख्यमंत्री के पद से
इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को
वाराणसी में चुनौती दी, जिसमें उन्हें मात मिली.
केजरीवाल के बारे में 20 बातें
अरविंद केजरीवाल का जन्म 16 अगस्त, 1968 को हरियाणा के भिवानी ज़िले में
हुआ था. उनके पिता पेश से इंजीनियर थे. उनका बचपन उत्तर भारत के विभिन्न
शहरों में बीता है.
अरविंद केजरीवाल ने आईआईटी, खडगपुर, से मैकेनकिल इंजीनियरिंग में बीटेक किया है.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने करियर की शुरुआत टाटा स्टील, जमशेदपुर से की. 1992 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया.
साल 1995 में भारतीय राजस्व सेवा(आईआरएस) के लिए चयनित हुए.
अरविंद केजरीवाल ने राजस्व सेवा में
अपनी नौकरी के दौरान ही 1999 में दिल्ली में परिवर्तन नामक एनजीओ शुरू
किया. विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले इस एनजीओ में मनीष
सिसोदिया उनके साथी थे. साल 2000-01 से ही परिवर्तन विभिन्न सरकारी
संस्थानों में पारदर्शिता लाने के लिए प्रयासरत रहा.
साल 2002 में उन्होंने उच्च शिक्षा के
लिए राजस्व सेवा से दो वर्ष का वैतनिक अवकाश ले लिया. उन्हें यह अवकाश इस
शर्त पर मिला था कि दोबारा ज्वाइऩ करने के बाद वो कम से कम तीन साल तक
नौकरी से इस्तीफ़ा नहीं देंगे. अगर वो ऐसा करते हैं तो उन्हें अवकाश के
दौरान ली गई तनख्वाह लौटानी होगी.
नवंबर, 2002 में उन्होंने फिर से नौकरी ज़्वाइन की लेकिन 18 महीने बाद ही उन्होंने 18 महीने का अवैतनिक अवकाश ले लिया.
साल 2005 में अरविंद केजरीवाल और मनीष
सिसोदिया ने कबीर नामक एनजीओ शुरू किया. केजरीवाल के अनुसार कबीर का संचालन
मुख्य रूप से मनीष सोसोदिया के हाथ में है.
साल 2005 में बने 'सूचना का
अधिकार'(आरटीआई) क़ानून के लिए संघर्ष में अन्ना हज़ारे, अरुणा रॉय जैसे
सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ अरविंद केजरीवाल भी सक्रिय रहे.
साल 2006 में केजरीवाल ने राजस्व सेवा
से इस्तीफ़ा दे दिया. उस समय केजरीवाल दिल्ली में आयकर विभाग में ज्वाइंट
कमिश्नर पद पर थे. हालांकि बाद में उनके इस्तीफ़े पर विवाद हुआ. साल 2011
में उन्होंने वैतनिक अवकाश के बाद तीन साल नौकरी पूरी न करने के मामले को
लेकर क़रीब नौ लाख रुपए विभाग को वापस किए.
साल 2006 में ही केजरीवाल को उभरते नेतृत्व वर्ग में रामन मैग्सेसे पुरस्कार मिला.
साल 2011 में अन्ना हज़ारे के नेतृत्व
में शुरू हुए इंडिया अंगेस्ट करप्शन आंदोलन में केजरीवाल, किरण बेदी,
प्रशांत भूषण इत्यादि के साथ शामिल थे. अन्ना और उनके साथियों की माँग थी
कि केंद्र में एक जन लोकपाल विधेयक लाया जाए जिससे भ्रष्टाराचर के मुद्दों
के निपटारे के लिए एक केंद्रीय लोकायुक्त नियुक्त किया जा सके.
अगस्त, 2011 में सरकार और अन्ना हज़ारे के बीच एक सहमति बनी और केंद्र मे लोकपाल विधेयक पारित हुआ.
साल 2012 में अरविंद केजरीवाल ने एक
राजनीतिक पार्टी के गठन की घोषणा. अन्ना हज़ारे, किरन बेदी इत्यादि ने उनके
इस फ़ैसले से ख़ुद अलग कर लिया. प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया उनके साथ
रहे. इस तरह भारत में एक नए दल 'आम आदमी पार्टी' की नींव पड़ी.
आम आदमी पार्टी ने पहली बार चुनावी
राजनीति में 2013 में हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में उतरी. पार्टी ने सभी
राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाते हुए दिल्ली की 70 सीटों में से 28 सीटों पर
जीत हासिल की. ख़ुद केजरीवाल ने दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रही शीला
दीक्षित को 20 हज़ार से ज़्यादा वोटों से हराया.
चुनाव के दौरान केजरीवाल के निशाने पर
मुख्य तौर पर कांग्रेस थी लेकिन उन्होंने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से
दिल्ली में सरकार बनाई और दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ
ग्रहण की.
केजरीवाल मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन महज 49 दिन बाद ही उन्होंने दिल्ली के जनलोकपाल विधेयक मुद्दे पर पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
2014 के लोक सभा चुनावों में केजरीवाल
वाराणसी लोक सभा सीट से भाजपा नेता नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ उतरे. हालांकि
उन्हें क़रीब तीन लाख मतों से हार का सामना करना पड़ा.
लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को दिल्ली
की सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा लेकिन पार्टी को पंजाब में चार
सीटों पर जीत मिली. इस तरह अपने पहले ही संसदीय चुनाव में उनके पास चार
संसद बने.
दिल्ली में किसी भी दल के पास पूर्ण
बहुमत न होने के कारण फ़रवरी, 2015 में दोबारा चुनाव हुए और इस चुनाव में
उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने आईं पुरानी सहयोगी किरन बेदी.
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